वीरेंदर सिंह लाठर
भारत में आदिकाल से कृषि विपणन व्यवस्था किसानों के लिए शोषणकारी रही है। मध्यकालीन भारत में ग्रामीण क्षेत्र में समुचित मुद्रा व्यवस्था और नाप-तोल पैमाने उपलब्ध नहीं होने के कारण कृषि विपणन वस्तु विनिमय प्रणाली पर आधारित था।
अंग्रेजों के राज में भी समुचित कृषि उपज मंडियों के अभाव में साहूकार और बिचौलियों की दुकानों पर कृषि विपणन कच्चे नाप-तोल पैमाने और शोषणकारी मूल्य पर ही चलता रहा और किसानों का खुला आर्थिक शोषण होता था।
देश में कृषि विपणन के लिए सबसे अहम क्रान्तिकारी सुधार, वर्ष-1939 में सर छोटूराम ने पंजाब कृषि उपज मार्केट एक्ट बनाकर किया, जिसमें कृषि उपज मंडियों को सरकारी नियंत्रण में स्थापित किया गया। आजादी के बाद, लगभग सभी राज्यों ने इस कानून को अपनाते हुए अपने राज्यों में कृषि उपज मंडियों की स्थापना की। इन कृषि उपज मंडियों में, सरकारी कानूनों के तहत कृषि उपज की मंडियों में खुली बोली द्वारा बिक्री का प्रावधान रखा गया। लेकिन कृषि उपज मंडियों में किसान की उपज को सस्ते में खरीदने के लिए, चतुर साहूकार और बिचौलये कारोबारी कार्टेल बनाकर खुली बोलियों में दाम की हेराफेरी करके किसानों का खूब शोषण करते रहे हैं।
किसानों को आर्थिक शोषण से बचाने के लिए, वर्ष-1966 में सरकार ने फसलों का समर्थन मूल्य घोषित करने की पॉलिसी बनाई। जिसके अन्तर्गत सरकार प्रतिवर्ष फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करती है और इन मूल्यो पर सार्वजनिक खाध्य वितरण प्रणाली के लिए सरकारी खरीद भी करती है। जिसके अनुसार घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम पर कृषि उपज की खरीद किसानों का खुला शोषण है। जिसे रोकना सरकार की कानूनी जिम्मेवारी है। लेकिन पिछले 58 वर्ष में किसी भी सरकार ने किसानों के शोषण को रोकने के लिए घोषित समर्थन मूल्य की कानूनी बाध्यता कृषि उपज मंडियों में लागू नहीं की।
अन्तरराष्ट्रीय आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन की रिपोर्ट के अनुसार किसानों को एमएसपी से कम दाम मिलने से पिछले 2 दशक में लगभग 60 लाख करोड रुपए का नुकसान हुआ है। इसके अलावा सरकार ने केवल एक वर्ष 2024 में ही, हरियाणा- पंजाब से गेहूं-धान की सरकारी खरीद सी-2( कुल लागत) की बजाय ए-2+एफएल लागत पर एमएसपी घोषित पर करके, किसानों का 40 हजार करोड़ रूपए से ज्यादा का नुकसान पहुंचाया है। कृषि विपणन में वर्षों से जारी इन सरकारी और साहूकारी शोषण के कारण से ही, दुनियाभर में सर्वोतम कृषि उत्पादकता लेने वाले हरियाणा- पंजाब के किसान गरीब और कर्ज दार बनते गए और आत्महत्या करने पर भी मजबूर हुए है। इन्ही आर्थिक शोषण से बचने के लिए, किसान एमएसपी कानूनी गारंटी की मांग के लिए लगातार अन्दोलन कर रहे है।
भारत 1 जनवरी 1995 को विश्व व्यापार संगठन का सदस्य बना, जिसका मुख्य उद्देश्य दूनियाभर में मुक्त व्यापार को बढ़ावा देना है। इस मुक्त व्यापार के लिए अन्तराष्ट्रीय दबाव के कारण ही, राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध सरकार देश में कृषि विपणन का वैश्वीकरण करने के लिए वर्ष- 2020 में निरस्त तीन कृषि कानून लाई थी। जिनका मुख्य उद्देश्य किसान हितैषी सरकारी कृषि उपज मंडी सिस्टम, समर्थन मूल्य पॉलिसी आदि व्यवस्था को समाप्त करके, देश में कार्पोरेट खेती और कृषि विपणन व्यवस्था को बढ़ावा देना था। लेकिन इन किसान विरोधी कानूनों के खिलाफ देशव्यापी किसान आन्दोलन और चुनाव-2024 की राजनीतिक मजबूरी की वजह से, सरकार को इन कृषि कानूनों को निरस्त करना पड़ा था।
अब उसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए, सरकार 25 नवम्बर 2024 को निरस्त कृषि कानूनों को नए रूप में एग्रीकल्चर मार्केटिंग पॉलिसी ड्राफ्ट के तौर पर लेकर आई है। जिसमें निजी थोक मंडियों की स्थापना, प्रसंस्करणकर्ताओं, निर्यातकों, संगठित खुदरा विक्रेताओं, थोक खरीदारों द्वारा थोक प्रत्यक्ष खरीद की अनुमति देना व गोदामों/साइलो/शीतगृहों को मान्य बाजार-यार्ड घोषित करना और निजी ई-ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म की स्थापना और संचालन की अनुमति देना आदि बहुत प्रावधान ऐसे रखे गए है, जिनके कारण मौजूदा सरकारी कृषि उपज मंडी सिस्टम, समर्थन मूल्य पॉलिसी आदि व्यवस्था का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा।
बिना सरकारी निगरानी के मार्केटिंग के कई चैनल खोलने से शोषण और धोखाधड़ी का खतरा बढ़ सकता है। ड्राफ्ट पॉलिसी फ्रेमवर्क में कृषि बाजारों के रेगुलेशन का कोई जिक्र नहीं है। न ही अनरेगुलेटेड थोक बाजार और प्राइवेट थोक बाजारों से जुड़ी समस्याओं को हल करने का प्रस्ताव है। लेकिन निजी बाजारों या अनियमित बाजारों को अतार्किक ढंग से बढ़ावा दिया गया है।
वैश्वीकरण के अन्तराष्ट्रीय दबाव में, मौजूदा सरकार किसान- कृषि और उपभोक्ता को कार्पोरेट खेती और मुक्त व्यापार कृषि विपणन व्यवस्था के अमरीकी व पश्चिमी देशों के मॉडल के हवाले करना चाहती है। जिस में किसान और उपभोक्ता दोनो का खुला शोषण होगा और देश की खाद्य सुरक्षा भी खतरे में पड़ेगी। क्योंकि मुक्त व्यापार विपणन व्यवस्था में कार्पोरेट कम्पनियां किसान से सस्ते दाम पर खाद्य पदार्थ खरीदकर, अपने गोदामो में भण्डारण करेगी और मुनाफा बढ़ाने के लिए मनमाने दाम पर दूनियाभर में कही भी अपना सामान बेच सकेगी। आजादी से पहले इसी तरह की एक कम्पनी की मुनाफाखोरी के कारण, भारत बंगाल अकाल जैसी त्रासदी देख चुका है। जिसमें कम्पनी के गोदाम चावल से भरे होने के बावजूद, 30 लाख लोग अनाज नहीं मिलने से भूख से मर गए थे।
कृषि विपणन में मुक्त व्यापार और वैश्वीकरण को बढ़ावा देने के नाम पर, प्रस्तावित एग्रीकल्चर मार्केटिंग पॉलिसी ड्राफ्ट का किसान संगठनों के साथ-2 कृषि उपज मंडियों के आढ़ती व व्यापार मंडल और कृषि में उन्नत पंजाब जैसी राज्य सरकारे़ भी विरोध कर रहे हैं, क्योंकि यह मार्केटिंग पॉलिसी किसान और कृषि उपज मंडी सिस्टम, समर्थन मूल्य पॉलिसी के लिए काल साबित होगी।
न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की कानूनी गारंटी किसानों की प्रमुख लंबित मांग है लेकिन सरकार के पॉलिसी ड्राफ्ट में इसे पूरी तरह नजरअंदाज किया गया है। एक बड़ी खामी यह भी है कि इसमें अंतरराष्ट्रीय व्यापार नीतियों और प्रतिबद्धताओं का कोई जिक्र नहीं है। केंद्र सरकार द्वारा इस किसान विरोधी मार्केटिंग पॉलिसी को लागू करने की बार-बार कोशिश, संविधान में दिये गए राज्यों के कृषि विपणन अधिकारों को छीनने का गम्भीर षडयंत्र है। क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 246 के अंतर्गत सातवीं अनुसूची की सूची-II (राज्य सूची) की प्रविष्टि 28 में कृषि विपणन राज्य का विषय है। अत: केंद्र सरकार द्वारा इस कृषि विपणन मार्केटिंग पॉलिसी को राज्य सरकारों, किसानों, राज्यो की कृषि उपज मंडियों पर थोपना सवैधानिक प्रावधानों का खुला उल्लंघन है।
साभार डाउन टू अर्थ