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गांव मांगेआना स्थित फल उत्कृष्टता केंद्र में रेवाड़ी से आए प्रगतिशील किसान गुरुकुल कुरुक्षेत्र में प्राकृतिक खेती के रिसोर्स पर्सन यशपाल खोला ने उपस्थित किसानों को प्राकृतिक खेती करने के नुस्खे बताए। प्राकृतिक खेती की विस्तार पूर्वक जानकारी देते हुए यशपाल ने अपने संबोधन में प्राकृतिक खेती के अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि प्राकृतिक खेती आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत है।
प्राकृतिक खेती के रिसोर्स पर्सन यशपाल खोला ने कहा कि पहले बड़े-बुजुर्ग घर पर खाने के लिए कुछ क्षेत्र में फसलें बोते थे। बेचने के लिए हाइब्रिड बीजों व खाद का इस्तेमाल करके बाकी बची जमीन पर खेती की जाती थी। ताकि पैदावार अधिक हो सके और बेचकर अच्छा मुनाफा कमाया जा सके। लेकिन आज के समय में हमारे देश में पैदावार इतनी अधिक हो गई है कि अनाज, सब्जियां और फल सरप्लस है। ऐसे में अनाज मंडी में इसका न तो अच्छा भाव मिल पा रहा है और खाने में ये नुकसानदायक है।
खोल ने कहा कि हमारे शरीर को बड़ी-बड़ी बीमारियां घेर रही है। कैंसर, डायबिटीज तेजी से बढ़ रही है। छोटे-छोटे बच्चों में पैरालिसिस और एलर्जी हो रही है। ये सभी बीमारियां हमारे दूषित हो चुके भोजन की वजह से हो रही है। आज जो खेत में अनाज और दालों की फसलों में हम पेस्टिसाइड और रासायनिक खादों का अंधाधुंध उपयोग कर रहे हैंं। ये रसायन हमारी फसलों में आते हैं और इन फसलों से जो भोजन बनाकर हम अपनी थाली में लेते हैं। वह भोजन हमारे शरीर में जाता है। शरीर के अंदर जाने के बाद ये खतरनाक बीमारियां जन्म लेती है।
इन बीमारियों के चलते लोगों की उम्र भर की बचा कर रखी गई कमाई इलाज में खर्च हो जाती है। शरीर का स्वास्थ्य खराब हो जाता है, परिवार की आर्थिक स्थिति खराब हो जाती है। इन सब समस्याओं से बचने की एक ही जगह है वह किसान का खेत। खेतों के अंदर जो भी उत्पादन किसान ले रहे हैं वह प्राकृतिक खेती के माध्यम से लें। गांव मांगेआना स्थित फल उत्कृष्टता केंद्र में भी प्राकृतिक खेती की यूनिट लगी हुई है। किसान इस यूनिट में आकर भी प्राकृतिक खेती करने की जानकारी हासिल कर सकता है। बगैर कीटनाशकों के किस प्रकार से फसल तैयार कर सकते हैं।
ऐसे करे प्राकृतिक खेती की शुरूआत।
फल एक्सपो में उपस्थित किसानों को प्राकृतिक खेती करने के नुस्खे बताते हुए यशपाल खोला ने कहा कि प्राकृतिक खेती शुरू करने के लिए सबसे पहले किसान अपने खेत की मिट्टïी और पानी के नमूनों की सरकारी लैब में जांच कराए। ताकि खेत की मिट्टïी का ऑर्गेनिक लेवल व पानी का पी.एच. लेवल का पता लग सके। ये जानने के बाद किसान अपने खेत में एक जगह फाइनल करे।
रिसोर्स पर्सन यशपाल खोला ने कहा कि अगर किसी किसान के पास 10 एकड़ जमीन है तो उसे 1 एकड़ जमीन से प्राकृतिक खेती की शुरुआत करनी चाहिए। उस एक एकड़ में किसी प्रकार की रासायनिक खाद, आर्गेनिक खाद, बायो पेस्टिसाइड, बायो फर्टिलाइजर का प्रयोग नहीं करना है। इस एक एकड़ जमीन को पूरी तरह से गो आधारित काम करना है। खेत में उत्पादित हरी खाद या नीम के पत्ते, गाय का गोबर, गोमूत्र का प्रयोग करके नेचुरल फार्मिंग का सप्लीमेंट बनाकर जमीन की उर्वरा शक्ति को बढ़ाता है। जितने भी पौधे हैं उनके पोषक तत्वों की पूर्ति भी नेचुरल तरीके से ही करनी है।
रिसोर्स पर्सन यशपाल खोला ने कहा कि 1 एकड़ नेचुरल फार्मिंग वाली जगह के चारों तरफ एक बफर जोन बनाकर पौधे लगाएं। जिसमें नेपियर घास, हरड़ या ज्वार लगाकर खेत को चारों तरफ से कवर किया जा सकता है। इसके अलावा गन्ना भी लगा सकते हैं। ताकि पड़ोस के खेत में अगर कोई पेस्टिसाइड का छिडक़ाव कर रहा है तो वह इस नेचूरल फार्मिंग वाली जगह तक न पहुंचे। बफर जोन बनाने से गर्म हवाओं से भी फसल की सुरक्षा हो सकेगी। बफर जोन तैयार होने के बाद जमीन में सबसे पहले हरी खाद का प्रयोग शुरू कर दें। रबी की फसल कटाई के बाद और अगली बुवाई के बीच के समय में किसान मूंग व अरहर की दालों व ढेंचे की बुवाई जरूर करें। इन दिनों में गर्म हवाएं चलती है जिससे जमीन का आर्गेनिक मेटर उड़ जाता है। मूंग, अरहर व ढैंचा की बुवाई करने से खेत ढक जाएगा तो सूरज की तेज रोशनी सीधे खेत की जमीन पर नहींं पड़ेगी। जिससे जमीन का आर्गेनिक मेटर बचा रहेगा।
यशपाल खोला ने कहा किसाथ ही बीच के समय में किसान एक फसल ले सकेगा। बाद में इस फसल के अवशेषों को जमीन की मिट्टी में मिक्स करने से जमीन में नाइट्रोजन की आवश्यकता की पूर्ति हो जाएगी। जमीन में जो जीवाणु हैं उन्हें कच्चे पदार्थ के तौर पर मिल जाएगी। ये जीवाणु फसल अवशेषों को खाकर मिट्टी की उपजाऊ शक्ति को बढ़ाएंगे।
खोला ने कहा किजमीन की मिट्टी में सुक्ष्म जीवाणु तैयार करने के लिए जीवामृत तैयार करने के लिए 200 लीटर का प्लास्टिक का ड्रम लेना होगा। इस ड्रम 180 लीटर पानी, 1 किलो गुड़, 1 किलो बेसन 8 से 10 लीटर गोमूत्र 8 से 10 किलो ताजा गाय का गोबर लेना है। गाय के गोबर में बहुत ज्यादा बैक्टीरिया होते हैं। सबसे पहले ड्रम में ताजा गोमूत्र, गोबर डालना है। इसके बाद गुड़ और बेसन डालना है। आखिर में 100 से 150 ग्राम सजीव मिट्टïी डालनी है। यह मिट्टïी बड़ पीपल के पेड़ के नीचे से लें या फिर खेत के उस कोने से लें जहां पेस्टिसाइड का कभी छिडक़ाव नहीं किया गया हो। इस ड्रग को जालीदार कपड़े से ढक़ देना है। ड्रम को छायादार जगह पर ही रखना है। डंडे के की सहायता से इस घोल को रोजाना सुबह शाम मिक्स करना है। गर्मी के दिनों यह जीवा अमृत 48 घंटों में और सर्दियों में 72 घंटे लगते हैं। रिसोर्स पर्सन यशपाल ने उपस्थित किसानों को बताया कि खेत में फ्लड सिंचाई करने के दौरान 200 लीटर जीवामृत खाद प्रति एकड़ में दे सकते हैं। जमीन में जाकर सूक्ष्म जीवाणुओं की संख्या को बढ़ाएगा।
प्राकृतिक खेती के लिए 2 हजार 481 करोड़ रुपए का बजट
माइक्रोबायोलॉजिस्ट डा. बलजीत सहारण प्राकृतिक खेती जब आई तब कुछ लोगों को लग रहा था कि इसमें नुकसान हो जाएगा, फसलों में बीमारियां आती है। जब देश किसी दिशा में चलता है तो उसके लिए बहुत सारी स्टडी होती है। देश के प्रधानमंत्री ने प्राकृतिक खेती को मिशन बनाया है। सरकार ने 2 हजार 481 करोड़ रुपए का बजट प्राकृतिक खेती के लिए ही दिया गया है। सभी बड़ी-बड़ी यूनिवर्सिटी प्राकृतिक खेती के काम में लगी हुई है। प्राकृतिक खेती से पैदा होने वाली फसलें इंसान के स्वास्थ्य के लिए अच्छी होती है।
डा. सहारण ने कहा कि रासायनिक खेती से पैदा होने वाली फसलों से इंसानों में कैंसर व डायबिटीज की बीमारियां बढ़ रही है। लेकिन प्राकृतिक खेती पर्यावरण व इंसान दोनों के लिए फायदेमंद है। प्राकृतिक खेती छोटी जोत से शुरू करनी है। अगर किसी किसान के पास 10 एकड़ जमीन है तो वह इसे 1 एकड़ से शुरू करे। किसानों को इतना रिस्क कभी नहीं लेना चाहिए कि उसका एक फसल का सीजन बर्बाद हो जाए। अगर किसान का 1 फसली सीजन फेल हो जाता है तो वह 4 से 5 साल तक उबर नहींं पाता है। प्राकृतिक खेती शुरू करने से पहले किसान ट्रेनिंग जरूर ले।